कुल्लू/मनमिंद्र अरोड़ा– हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में पाई जाने वाली कांटेदार बूटी ,बिच्छू बूटी अब कपड़ा बनाने के काम भी आएगी। वहीं जिला कुल्लू के पर्यटन नगरी मनाली के समीप ग्राम पंचायत शलीन में स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं को इस बूटी से कपड़ा तैयार करने की तकनीक भी समझाई जा रही है। ताकि जंगलों में उगने वाली बूटी के माध्यम से कपड़ा बनाकर स्वयं सहायता समूह आर्थिक रूप से मजबूत हो सके।
मनाली में महिलाओं को दिया जा रहा प्रशिक्षण
महिलाओं को उत्तराखंड बैंबू डेवलपमेंट बोर्ड की ओर से प्रशिक्षण दिया जा रहा है। ऐसे में एक महीना तक महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जाएगा और उसके बाद सहायता समूह की महिलाएं अपने स्तर पर बिच्छू बूटी से कपड़ा तैयार कर सकेंगे। हालांकि यह बिच्छू बूटी ग्रामीण इलाकों में औषधीय गुणों के लिए भी जानी चाहती है। लेकिन पहली बार अगर इस बूटी से कपड़ा तैयार करने की तकनीक भी महिलाओं को सिखाई जा रही है।
सर्दी में शरीर को गर्म और गर्मी में ठंडा रखेगा इससे बना कपड़ा
वही, आईआईटी मंडी के द्वारा भी इस विषय में प्रयास किए गए है। आई आई टी शोधकर्ता बिच्छू बूटी (अर्टिका पर्वीफ्लोरा) से बने धागे को कॉटन के साथ मिश्रित कर उच्च गुणवत्ता फैब्रिक बनाने में सफल रहे हैं। यह फैब्रिक (कपड़ा) सर्दी में शरीर को गर्म और गर्मी में ठंडा रखेगा और रंगाई में प्राकृतिक रंगों का उपयोग होगा। अब शोधकर्ता बिच्छू बूटी के अलावा हिमालय क्षेत्र में पाए जाने वाली अन्य घास की कई किस्मों से भी फाइबर-फैब्रिक बनाने की तकनीक पर काम कर रहे हैं। यदि ऐसा हुआ तो हिमाचल के जंगलों को बिच्छू बूटी की झाड़ियों से छुटकारा मिलेगा और पौधरोपण क्षेत्र का दायरा भी बढ़ेगा। ऐसे में भविष्य के लिए इस फैब्रिक के उत्पादन में लगी कंपनियों के लिए बिच्छू बूटी एकत्र करवाने के लिए स्वयं सहायता समूहों और महिला मंडलों की मदद लिए जाने की योजना है। इससे रोजगार के अवसर सृजित होने से लोगों की आर्थिकी सुदृढ़ होगी।
फैब्रिक की कीमत हो सकती है 200 से 250 मीटर
हिमाचल सहित हिमालय क्षेत्र के कई राज्यों में पहले बिच्छू बूटी साग या फिर दवा बनाने तक ही सीमित थी। इसमें विटामिन ए, सी, आयरन और कैल्शियम पाया जाता है। चंबा, मंडी, कुल्लू, लाहौल-स्पीति, शिमला, रामपुर की बिच्छू बूटी सर्वोत्तम मानी जाती है। इसके पत्तों पर कांटे होने के कारण इनके चुभने से जलन होती है। पहले लोग इस पौधे को बेकार मानते थे, जबकि इससे बने फैब्रिक की कीमत 200 से 250 रुपये मीटर तक हो सकती है।
बताया जा रहा है कि हिमाचल में पहली बार बिच्छू बूटी से कपड़ा तैयार किया जाएगा। हालांकि इससे पहले उत्तराखंड और कई अन्य स्थानों पर इससे बने उत्पाद बनाये जाते है। लेकिन यहाँ पहली बार पंचायत की महिलाओं को ये हुनर सिखाया जा रहा है। जिससे ग्रामीण महिलाएं आजीविका भी कमा पाएंगी। जिला कुल्लू में भी जंगलों में बिच्छू बूटी बहुतायत में पाई जाती है। ऐसे में ट्रेनिंग लेकर ग्रामीण इलाकों की महिलाएं अपने आप को आत्मनिर्भर बना सकती हैं।
उत्तराखंड बैम्बू एंड फाइबर डेवलपमेंट बोर्ड से आए सुरेंद्र ने बताया कि उत्तराखंड में भी बिच्छू बूटी का कपड़ा बहाने उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। ऐसे में अब मनाली में भी महिलाओं को इसका प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षण के बाद महिलाएं बिच्छू बूटी के रेशे से कपड़ा तैयार कर मैट, बैग व अन्य सामान बना सकेंगे।
पहली बार सीख रहे बिच्छू बूटी से रेशा निकालना
इस प्रशिक्षण में भाग ले रही महिला दुर्गा देवी ने बताया कि पुराने समय में ग्रामीण क्षेत्र में लोग भांग के रेशों से कई प्रकार की चीजें तैयार करते थे। लेकिन बिच्छू बूटी से रेशा निकालकर सामान बनाने के बारे में उन्हें पहली बार जानकारी मिली है। ऐसे में उन्हें उम्मीद है कि इस प्रशिक्षण के बाद स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को काफी फायदा होगा।
