मंडी |बीते तीन-चार सालों से देवभूमि हिमाचल प्राकृतिक आपदाओं से लगातार झूझ रहा है। जिससे यहां के वासियों को नुकसान के साथ जनहानि का भी सामना करना पड़ा रहा है। हिमाचल में हो रहे इस विनाश का कारण देव समाज के द्वारा प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का नजीता माना जा रहा है। बीती रात को छोटी काशी मंडी के बगलामुखी मंदिर में वार्षिक जाग के बाद हुई देववाणी में इसी बात जिक्र किया गया है। बता दें कि देवभूमि हिमाचल में सदियों पुरानी देव परंपराओं को निर्वहन आज भी पूरी श्रद्धा भाव के साथ किया जाता है। ऐसी ही एक मान्यता के अनुसार हिंदी विक्रम संवत के अनुसार मंडी जनपद में भाद्रपद के महीने में देवताओं और डायनों के बीच होता है। जिसमें जनपद के विभिन्न देवालयों में रात्रि बारह बजे जाग होम का आयोजन किया जाता है। इन जाग होम के दौरान देवी-देवताओं के गुर आग के अंगारों पर चलकर अग्नि परीक्षा देकर देववाणी करते हैं। मान्यता के अनुसार देवी-देवताओं के बीच छिडे़ महासंग्राम का परिणाम तुंगल घाटी के सेगली में विराजमान माता बगलामुखी मंदिर में वार्षिक जाग के बाद सुनाया जाता है। बीती रात को यह जाग संपन्न हुई जिसमें क्षेत्र के सैंकड़ों लोगों ने पहुंचकर देवताओं और डायनों के बीच हुए युद्धों का वृतांत देववाणी के माध्यम से सुना। इस मौके पर मंदिर में रात 12 बजे तक भजन कीर्तन का भी आयोजन किया गया। जिसमें भक्ति भाव में श्रद्धालु खूब झूमते हुए नज आए। मंदिर के पुजारी अमरजीत शर्मा ने बताया कि देववाणी में डायनियों की विजय हुई है और डायनियों की विजय को भविष्य के लिए चेतावनी माना जा रहा है। इससे जनमानस को भूकंप, बाढ़, अकाल मृत्यु जैसी आपदाओं का सामना करना पड़ सकता है। देववाणाी में यह चेतावनी भी दी कि मनुष्य प्रकृति और देवनीति के साथ छेड़छाड़ कर रहा है, जिससे यह आपदाएं बढ़ रही हैं। यदि मनुष्य जल्द अपनी हरकतों को नहीं छोड़ता है तो आने वाले समय में और भी गंभीर परिणाम उसे भुगतने होंगेे।
वहीं पुजारी ने बताया कि भाद्रपद के इस महीने में जनपद के अधिकतर देवी-देवताओं के मंदिरों के कपाट बंद रहते है। मान्यता के अनुसार ऋषि पंचमी के दिन यान आज देवी देवता हार-पासे का खेल खेलकर वापस मंदिरों में लौटते हैं। आषाढ माह की शैण देनी एकादशी को देवता युद्ध के लिए प्रस्थान करते हैं। भाद्रपद कृष्ण पक्ष के बाद पहला युद्ध समुद्र के तट और अंतिम युद्ध घोघर धार में पर होता है। इस महासंग्राम में कुल सात बार देवताओं और डायनियों के बीच युद्ध हुआ। जिसमें से तीन बार देवता विजयी रहे और तीन बार डायनियां विजयी रही । अंतिम युद्ध में डायनियां शिख-पाथा लेकर चली गईं, जिसके कारण इस वर्ष उन्हें विजयी माना गया।
