शिमला -: मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने कहा है कि बदलते समय की चुनौतियों और प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते प्रभावों को देखते हुए लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) को अधिक सशक्त, तकनीक आधारित और आधुनिक कार्य प्रणाली अपनानी होगी। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि राज्य सरकार भविष्य में विभाग के कार्यक्षेत्र को और विस्तारित करने पर गंभीरता से विचार कर रही है ताकि अधोसंरचना विकास के नए क्षेत्रों में भी इसकी भूमिका सुनिश्चित की जा सके।
मुख्यमंत्री आज शिमला में ‘लोक निर्माण विभागों में गुणवत्ता आश्वासन’ विषय पर आयोजित उत्तर क्षेत्रीय अंतर-राज्यीय संवाद सत्र की अध्यक्षता कर रहे थे। इस कार्यक्रम में हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड और राजस्थान के वरिष्ठ अधिकारी तथा अभियंता शामिल हुए। कार्यक्रम का उद्देश्य निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, नई तकनीकों के उपयोग और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए साझा रणनीति तैयार करना था।
मुख्यमंत्री ने कहा कि पिछले तीन वर्षों के दौरान हिमाचल प्रदेश ने कई बड़ी प्राकृतिक आपदाओं का सामना किया है। इन कठिन परिस्थितियों में लोक निर्माण विभाग ने सड़क संपर्क बहाल करने और प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंच सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की सराहना करते हुए कहा कि आपदा प्रबंधन और पुनर्निर्माण में उनकी सेवाएं उल्लेखनीय रही हैं।उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव हिमाचल प्रदेश में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाएं अधोसंरचना को लगातार नुकसान पहुंचा रही हैं। भविष्य में अन्य राज्यों को भी ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। हिमाचल प्रदेश का लगभग 90 प्रतिशत भूभाग पहाड़ी है, इसलिए यहां सड़क संपर्क जीवनरेखा के समान है। ऐसे में सड़कों और पुलों की गुणवत्ता तथा टिकाऊपन सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि विभाग को अब पारंपरिक निर्माण कार्यों से आगे बढ़कर सुरंग निर्माण, बहुमंजिला भवनों और अन्य उन्नत अधोसंरचना परियोजनाओं पर भी ध्यान देना चाहिए। नई तकनीकों को अपनाने में प्रारंभिक चुनौतियां अवश्य आती हैं, लेकिन दीर्घकालिक विकास और संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए यह आवश्यक है। उन्होंने अधिकारियों से आधुनिक तकनीकों और नवाचारों को कार्य संस्कृति का हिस्सा बनाने का आह्वान किया।उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं से क्षतिग्रस्त अधोसंरचना के पुनर्निर्माण की चुनौती और बड़ी होने वाली है। वर्तमान में राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग चार प्रतिशत हिस्सा आपदा पुनर्निर्माण कार्यों पर खर्च हो रहा है। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक यह व्यय बढ़कर 14 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। इस बढ़ते दबाव को देखते हुए विभाग की कार्यक्षमता और तकनीकी क्षमता बढ़ाना समय की आवश्यकता है।मुख्यमंत्री ने कहा कि लोक निर्माण विभाग को केवल सड़क और भवन निर्माण तक सीमित नहीं रहना चाहिए। विभाग बांध निर्माण और अन्य बड़े अधोसंरचना क्षेत्रों में भी अपनी विशेषज्ञता विकसित कर सकता है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार विभाग के कार्यक्षेत्र का विस्तार कर उसे अधिक बहुआयामी बनाने की संभावनाओं का अध्ययन कर रही है।इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने ‘क्वालिटी कंट्रोल फॉर रोड वर्क्स’ नामक पुस्तक का विमोचन भी किया। यह पुस्तक सड़क निर्माण कार्यों में गुणवत्ता सुनिश्चित करने के विभिन्न मानकों और प्रक्रियाओं पर आधारित है।
लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने कहा कि क्षमता निर्माण और आधुनिक तकनीकों का उपयोग वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि ऐसे संवाद सत्र अभियंताओं को नई तकनीकों, नवाचारों और श्रेष्ठ कार्य प्रणालियों की जानकारी प्रदान करते हैं। उन्होंने ग्लोबल वार्मिंग से उत्पन्न चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि उत्तर भारत में अधोसंरचना विकास के लिए नई सोच और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है।
उन्होंने बताया कि हिमाचल प्रदेश में लगभग 45 हजार किलोमीटर लंबी सड़कें हैं और अधिकांश पंचायतें सड़क सुविधा से जुड़ चुकी हैं। ऐसे में इन सड़कों का नियमित रखरखाव बड़ी चुनौती बन गया है। इस दिशा में राज्य सरकार ने नई ड्रेनेज नीति तैयार की है, जिससे सड़कों की आयु बढ़ाने और रखरखाव में सुधार लाने में मदद मिलेगी। कार्यक्रम में उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान, विधायक विवेक शर्मा तथा विभिन्न राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी और अभियंता भी उपस्थित रहे।
