भावना शर्मा: देश भर में स्थित माता रानी के 51 शक्तिपीठों में से देवभूमि हिमाचल में भी कई शक्तिपीठ हैं। इस पवित्र धरती पर भी मां की कई शक्तिपीठ है बसते हैं जिनमें से एक शक्तिपीठ है हिमाचल के कांगड़ा जिला में स्थित ब्रजेश्वरी देवी के नाम से प्रसिद्ध शक्तिपीठ। हिमाचल के लोगों के साथ ही विश्व भर में प्रसिद्ध हैं। मान्यताओं के अनुसार इस स्थान मां सती का दाहिना वक्ष गिरा था जिसके बाद यहां इस शक्तिपीठ का निर्माण पांडवों की ओर से करवाया गया। मां ब्रजेश्वरी में श्रद्धालुओं की अटूट श्रद्धा और आस्था हैं। माता रानी के दर्शन मात्र से ही यहां भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
इस मंदिर में माता पिंडी रूप में विराजमान हैं। मंदिर में माता के 3 पंडित स्वरूप की पूजा की जाती हैं जिसमें से पहली पिंडी मां ब्रजेश्वरी, दूसरी मां भद्रकाली और तीसरे सबसे छोटी पिंडी मां एकादशी की हैं। इन तीनों की पंडियों की पूजा यहां मंदिर में माता के स्वरूप के रूप में की जाती हैं। कहा जाता है कि महाभारत काल में पांडवों ने यहां इस मंदिर का निर्माण करवाया था। मंदिर को लेकर भक्तों में बहुत श्रद्धा और आस्था हैं। भक्त यहां देश भर से माता रानी के दर्शनों के लिए पहुंचते हैं। इस मंदिर के ना केवल हिंदू समुदाय के लोग माता रानी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं बल्कि मुस्लिम और सिख समुदाय के लोगों की भी इस मंदिर में और मां ब्रजेश्वरी में बहुत श्रद्धा और आस्था हैं। यही वजह भी है कि मंदिर की यह विशेषता इसे अन्य शक्तिपीठों से अलग बनाती हैं।
इस संबंधी अपने मां ब्रजेश्वरी किस मंदिर में 1905 के भूकंप का दंश भी झेला। कांगड़ा नगरकोट में 1905 में आए भयंकर भूकंप में यह मंदिर पूरी तरह से नष्ट हो गया था। वर्तमान मंदिर का पुनः निर्माण 1920 में किया गया था। इसी के साथ यह शक्तिपीठ अनेकों मुस्लिम आक्रमणकारियों की लूट का केंद्र भी बना रहा मुस्लिम आक्रमणकारियों ने कई बार इस मंदिर को लूटा लेकिन आज भी यह मंदिर और शक्तिपीठ कांगड़ा जिला की भव्यता को बढ़ा रहा हैं।
इस तरह होती हैं मां ब्रजेश्वरी की पूजा
मां ब्रजेश्वरी देवी के इस शक्तिपीठ में प्रतिदिन मां की पांच बार आरती होती हैं। सुबह मंदिर के कपाट खुलते ही सबसे पहले मां की शैय्या को उठाया जाता हैं उसके बाद रात्रि के श्रृंगार में ही मां की मंगला आरती की जाती हैं। मंगला आरती के बाद मां का रात्रि श्रृंगार उतार कर उनकी तीनों पिंडियों का जल, दूध, दही, घी, और शहद के पंचामृत से अभिषेक किया जाता हैं। उसके बाद पीले चंदन से मां का श्रृंगार कर उन्हें नए वस्त्र और सोने के आभूषण पहनाएं जाते हैं। फिर आरती चना पूरी, फल और मेवे का भोग लगाकर संपन्न होती हैं।
मंदिर के तीन गुंबद हैं तीन धर्मों के प्रतीक
मां ब्रजेश्वरी के मंदिर का निर्माण किस तरह से किया गया है किस मंदिर में तीन तरह के गुंबद बनाए गए हैं। कहा जाता है कि तीन गुंबद तीन धर्मों के प्रतीक हैं।पहला गुंबद हिन्दू धर्म का प्रतीक है, जिसकी आकृति मंदिर जैसी है तो दूसरा मुस्लिम समाज का और तीसरा गुंबद सिख संप्रदाय का प्रतीक हैं। इसी वजह से तीनों धर्मों के लोग इस मंदिर में बिना धर्म जाति और समुदाय का भेदभाव किए माता रानी की पूजा अर्चना और दर्शनों के लिए आते हैं।
मंदिर भविष्य की घटनाओं और संकटों का पहले ही दे देता हैं संकेत
मां ब्रजेश्वरी का मंदिर ऐसा अद्भुत मंदिर है क्या मंदिर है जिला कांगड़ा में होने वाली भविष्य की घटनाओं और आने वाली घटनाओं का पहले ही संकेत दे देता हैं। बात सुनने में भले ही अजीब लगे लेकिन यहां के लोगों किस पर अटूट श्रद्धा और आस्था हैं। कहा जाता है कि ब्रजेश्वरी मंदिर के बायें तरफ भैरव नाथ की मूर्ति विराजमान हैं। भैरव नाथ भगवान शिव का ही एक अवतार माना जाता हैं। जब मंदिर के आसपास है मैं किसी तरह की कोई बड़ी समस्या आने वाली होती है तो यहां मंदिर में स्थित भैरव बाबा की मूर्ति से आंसुओं का गिरना और पसीना आना शुरू हो जाता हैं, जिसे देख कर मंदिर के पुजारी मंदिर में विशाल हवन का आयोजन करे मां ब्रजेश्वरी से आने वाली आपदा और मुसीबत को हटाने का निवेदन करते हैं। इस निवेदन को स्वीकारते हुए माता रानी क्षेत्र पर आने वाली विपदाओं को हर लेती हैं।
मुस्लिम आक्रमणकारियों ने लूटा मंदिर आज भी यहीं हैं स्थित
मां ब्रजेश्वरी का यह मंदिर 10वीं शाताब्दी तक बहुत ही समृद्ध हुआ करता था। इस मंदिर को कईं विदेशी आक्रमणकारियों ने कई बार लुटा था। सन 1009 में मौम्मद गजनी ने इस मंदिर को पूरी तरह से तबाह कर दिया था और इस मंदिर में चांदी से बने दरवाजों तक को उखाड कर ले गया था। यह भी माना जाता है कि मोहम्मद गजनी ने इस मंदिर को ही पांच बार लुटा था। उसके बाद 1337 में मोहम्मद बीन तुकलक और पांचवी शाताब्दी में सिंकदर लोदी ने भी इस समृद्ध शक्तिपीठ में लूट मचाई थी और इसे नष्ट कर दिया था। इस मंदिर को कई बार लुटा और तोड़ा गया, लेकिन फिर भी इसे बार बार पुनः स्थापित किया जाता रहा। लोगों का कहना है कि सम्राट अकबर भी यहां आए थे और उन्होंने इस मंदिर के पुनः निर्माण में सहयोग भी दिया था।
