चन्द्रिका – महाशिवरात्रि पर्व देवभूमि हिमाचल में हर वर्ष धूमधाम से मनाया जाता है । यहां ये पर्व हिमाचली परम्परा और संस्कृति के अनुसार मनाया जाता। विशेष तौर पर ऊपरी शिमला में महाशिवरात्रि पर्व की अपनी एक विशेषता है।
विधि विधान से महादेव को किया जाता है विदा
वैसे तो पूरे हिमाचल में महाशिवरात्रि धूमधाम से मनाई जाती है, लेकिन ऊपरी शिमला में इस दिन कुछ अलग तरीके से पूजा अर्चना की जाती है। इस पर्व को लेकर कई दिनों पहले तैयारियां की जाती है। शिवरात्रि के अवसर पर घरों में पारंपरिक ढंग से महादेव की प्रतिमा बनाकर व उनकी प्रतिष्ठापना कर पूजा करने की परंपरा है। इसके लिए घर का वरिष्ठ सदस्य या कोई अन्य व्यक्ति शिवरात्रि के दिन उपवास रखकर नरगिस फूल की पत्तियों, पाजा की पत्तियों, खट्टे फल व फूल पत्तियों को सूत के धागे में पिरोकर महादेव बनाते हैं। वही इसे शाम को विधि विधान से घर में प्रतिष्ठापित करते हैं। इसे शिव स्वरूप माना जाता है जिनकी पूजा अर्चना की जाती है। इस अवसर पर सभी मिलकर रातभर भजन कीर्तन करते है। वहीं ब्रह्मामुहूर्त के समय सूर्योदय से पहले घर में बनाए महादेव को विधि विधान से विदा किया जाता है और घर में सुख समृद्धि की कामना की जाती है।
शिवरात्रि के अगले दिन बेटियों के घर पहुंचाया जाता है बासा
महाशिवरात्रि पर्व पर ऊपरी शिमला में पारम्परिक तरीके से पकवान बनाए जाते है। शिवरात्रि के दिन घरों में कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं जिनमें पकैन, सनसे व रोट मुख्य हैं। घर में बने पकवान ही महादेव को चढ़ाए जाते हैं । वहीं ऊपरी शिमला के ग्रामीण क्षेत्रों में शिवरात्रि के अगले दिन से बासा ( पकवान ) बेटियों के घर पहुंचाने का प्रचलन है। लोग अपने आस-पड़ोस, सगे संबंधियों व मित्रों को बासा बांटते हैं। यह सिलसिला कई दिन तक चलता है। हालांकि पहले शिवरात्रि से एक माह तक बासा बांटने का दौर चलता था। लोग किल्टों में भर भरकर पकवान सगे संबंधियों और रिश्तेदारों को देने जाते थे लेकिन यह रिवाज अब धीरे-धीरे किल्टों से थैलों में सिमट कर रह गया है। व्यस्तता और बदलती जीवनशैली के कारण कुछ लोग अब रुपये देकर ही बासा रस्म निभाते हैं।
