भावना शर्मा : शिमला पर्यटक नगरी जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता के चलते विश्वभर में प्रसिद्ध हैं उसी स्थल की पहाड़ियों के बीच स्थित मां कामना देवी भी शिमला आने वाले पर्यटकों में प्रसिद्ध हैं। स्थानीय लोगों की यो इस मंदिर में आपार श्रद्धा है ही लेकिन बाहरी राज्यों से आने वाले पर्यटक भी कामना देवी का कर यहां माता के चरणों में माथा टेकना नहीं भूलते हैं। मंदिर इतना प्रसिद्ध हैं कि भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद भी 2 मर्तबा इस मंदिर में आ चुके हैं। हालांकि वो कब ओर किस खास उद्देश्य से इस मंदिर में आये थे इसकी जानकारी तो नहीं हैं। मंदिर में आने की एक खास वजह यह भी है कि मां कामना के मंदिर में आ कर की गई कामना अवश्य पूरी होती हैं। श्रद्धालुओं की यही आस्था है कि मां कामना देवी उन्हें मनवांछित फल देती हैं।
शिमला से 5 किलोमीटर को दूरी पर शिमला के उपनगर बालूगंज में मां कामना देवी का यह मंदिर हैं। मंदिर का इतिहास आज से लगभग 300 साल पुराना है और यहां माता की स्वयंभू मां दुर्गा के स्वरूप की मूर्ति मंदिर में विराजमान हैं। यह मूर्ति यहां ला कर स्थापित नहीं कि गईं है बल्कि खुद ब खुद यह मूर्ति यहां प्रकट हुई थी जिसके बाद स्थानीय लोगों ने यहां मंदिर की स्थापना की। पहले सड़क ना होने के चलते बालूगंज से पैदल पहाड़ चढ़कर यहां पहुंचा जा सकता था लेकिन अब गाड़ियों के लिए रास्ता बनने से यहां गाड़ियों के माध्यम से भी पहुंचा जा सकता हैं। जिस स्थान पर मंदिर स्थित है वो धार्मिक दृष्टि से तो खास है ही पर प्रकृति की दृष्टि से भी यह स्थान शांत और बेहद ही मनोरम हैं। पाइन और देवदार के पेड़ इस जगह को चारों ओर से घेरे हैं।
बात की जाए मंदिर के ऐतिहासिक महत्व के बारे में तो मंदिर वर्षों पहले क्रेडू के नाम से जाना जाता था। क्रेड़ू यानी कि खेलने का स्थान लेकिन जैसे जैसे लोग इस मंदिर में आने लगे और उनकी मनोकामनाएं पूरी होने लगी तो स्थानीय लोगों ने ही इस मंदिर का नाम मां कामना देवी रख दिया और आज इसी नाम से इस मंदिर की पहचान हैं। हर इच्छा व कामना पूर्ण करने वाली माता को स्थानीय लोगों ने कामना देवी का नाम दे दिया। मंदिर की देखरेख का जिम्मा एक ही परिवार की पीढ़ी दर पीढ़ी आगे चल रहा हैं। पहले इस मंदिर की देखरेख एवं पूजा आदि का कार्य स्वर्गीय पंडित सत्य प्रकाश देखते थे। वह मशहूर ज्योतिष विद्वान भी थे। उनके निधन के बाद मंदिर की व्यवस्था उनके पुत्र पंडित विनोद लखनपाल देख रहे हैं। उनके साथ नरेश कुमार और प्रवीण पूजा अर्चना की रस्में पूरी करवाते हैं। उनकी पांचवीं पीढ़ी मंदिर का सफल संचालन कर रही है। 1932 में उनके दादा पंडित सीता राम ने मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था, हालांकि इस मंदिर का निर्माण 300 साल से भी पुराना हैं।
साल भर आते हैं श्रद्धालु
वैसे तो साल भर यहां भक्तों का आना जाना लगा रहता है लेकिन नवरात्र में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती हैं। बाहरी राज्यों से आने वाले पर्यटक भी काफी संख्या में इस मंदिर में आते हैं। श्रद्धालु यहां कर माता से अपनी मनोकामना करते हैं और उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। मंदिर की यह भी मानता है कि जिन लोगों को संतान सुख की प्राप्ति नहीं होती हैं। माता कामना से इसकी कामना करने पर वो भी पूरी हो जाती हैं। मंदिर में मां दुर्गा के साथ ही मां भगवती और मां सरस्वती भी विराजमान है।
पेड़ पर डोरी बांध कर करते है कामना
मान्यता है कि इस धार्मिक स्थल में श्रद्धालु जो भी कामना करते हैं, मां कामना देवी उसे अवश्य पूरा करती हैं। श्रद्धालु मंदिर के द्वार पर स्थित अखरोट के पेड़ के मूड में रुमाल, चूड़ियां, डोरी आदि बांधकर मन्नत मांगते हैं। कामना पूरी होने पर श्रद्धालु मां के द्वार पर खुशी-खुशी आते हैं और पेड़ पर बांधी कोई भी एक मौली खोल देते हैं। यह मंदिर न केवल श्रद्धा का प्रतीक है बल्कि विश्व पर्यटन मानचित्र पर भी धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में जाना जाने लगा हैं।
निसंतान संतान की प्राप्ति की कामना के लिए आते है मंदिर
जिन लोगों के संतान न हो वह इस मंदिर में श्रद्धा पूर्वक जाते हैं और मां के मंदिर के बाहर पेड़ में एक सूत्र बांधते हैं जिसके बाद उनकी इच्छा पूर्ण हो जाती हैं। संतान प्राप्ति के बाद पुन: मंदिर में जाने के बाद इस सूत्र को खोला जाता हैं। निर्धन को माता के दरबार में धनवान होने का आशीर्वाद मिलता हैं।।
