भावना शर्मा: आज के समय में जहां पानी की किल्लत, मौसम में हो रहे बदलावों, आवारा जानवरों के फसल को तबाह करने की समस्याओं को देखते हुए लोग खेती बाड़ी छोड़ चुके हैं, तो ऐसे में एक शख्स ऐसे भी हैं जिन्होंने इसी खेती की अपना कर अपने जीवन की एक नई कहानी लिखी हैं। उन्होंने उस बात को सार्थक कर दिखाया हैं कि अगर व्यक्ति ठान ले और अपना लक्ष्य निर्धारित कर ले तो उसे मंजिल तक पहुंचने से कोई रोक नहीं सकता हैं।
कांगड़ा जिला के पालमपुर कस्बे के विकास खंड सुलाह की ग्राम पंचायत बारी के चंजेहड़ निवासी राजिंदर कंवर ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और कड़ी मेहनत के बलबूते पर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में काम किया हैं। अपने इस कार्य से वह युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का केंद्र बन गए हैं।
कांगड़ा जिला के चंजेहल निवासी 75 वर्षीय राजिंदर कंवर ने प्राकृतिक खेती को अपनाकर समाज के समक्ष उदाहरण प्रस्तुत किया हैं। उन्होंने प्राकृतिक खेती को अपनाया और कृषि लागत को लगभग शून्य करते हुए मुनाफा दो गुना से अधिक कमाया हैं। रजिंदर, 22 कनाल (11 बीघा) जमीन पर प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। इसमें गेहूं, भिंडी, चना, मटर, टमाटर, सरसों, घीया, तोरी, खीरा इत्यादि फसलों को प्राकृतिक तरीके से वह उगा रहें हैं।
उन्होंने बताया कि इसमें उनका व्यय 3 हजार और आय अढ़ाई लाख से अधिक हैं। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती से उत्पन्न उत्पादों की औसतन आयु अन्य उत्पादों से अधिक हैं। बाजार में मूल्य अच्छा होने के साथ-साथ मांग भी अधिक होने से किसानों को दोगुणा लाभ हो रहा हैं।
सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती ने आसान की उनकी राह
राजिंदर कंवर बताते हैं कि बंजर भूमि को खेती योग्य बनाने का काम सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती ने आसान किया हैं। उन्होंने बताया कि प्रदेश कृषि विभाग के सहयोग से मध्य प्रदेश के झांसी में सुभाष पालेकर से प्राकृतिक खेती के विभिन्न आदानों के निर्माण, प्रयोग, कीट रोग प्रबंधन का प्रशिक्षण प्राप्त किया। उन्होंने प्राकृतिक खेती को अपना कर सफलता प्राप्त की तो इससे उनका हौसला बढ़ गया। उन्होंने बंजर भूमि को खेती लायक बनाने की चुनौती स्वीकार किया और कड़ी मेहनत से प्राकृतिक खेती में सफलता हासिल की।
यहां से हुई प्राकृतिक खेती की शुरुवात
राजिंदर बताते है कि प्रशिक्षित होने के बाद उन्होंने साहीवाल नस्ल की गाय खरीदी। गाय के गोबर – मूत्र और स्थानीय वनस्पतियों से खाद बनाकर उन्होंने खेतों में इस्तेमाल शुरू कर दिया। उन्होंने बताया कि रसायनों का प्रयोग खेतों में नहीं करने से उन्हें जल्दी ही अच्छे नतीजे मिले और इसके बाद उत्साह से खेतों में जुट गए। उन्होंने प्राकृतिक खेती से 3 तरह की गेहूं उगाई हैं, जिसमें स्थानीय किस्म के साथ, बंसी और काली गेहूं भी शामिल हैं। मिश्रित खेती के तौर पर गेहूं के साथ सरसों और मटर की फसल भी उन्होंने ली हैं। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती में स्थानीय बीजों का बड़ा महत्व हैं वह अपनी खेती में स्थानीय बीजों का ही इस्तेमाल करते हैं। इससे पैदावार और फसल गुणवत्ता बाकि किसानों के मुकाबले बेहतर रहती है।
युवाओं और किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए कर रहे जागरूक
राजिंदर गांव के अन्य किसानों और युवाओं को प्राकृतिक खेती के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। उनका कहना है कि जब हमारा खानपान शुद्ध और रसायनरहित होगा तभी हम एक स्वस्थ जीवन यापन कर सकते हैं। आज के भागदौड़ भरे जमाने में अच्छे, पोषणयुक्त खाने का महत्व और बढ़ गया है। जब किसान रसायनरहित उगाएगा तो उसका परिवार और आस पड़ोस ही नहीं देश भी सेहतमंद होगा।
