मंडी, धर्मवीर – भारत में शरण लिए तिब्बती समुदाय के लोगों ने चीन पर उनकी संस्कृति और पहचान मिटाने के आरोप लगाए हैं। इनका कहना है चीन के द्वारा उनकी सांस्कृतिक पहचान को मिटाने के लिए उनके 5-7 साल के बच्चों को निशाना बनाया जा रहा है। यह आरोप मंडी में 67वें तिब्बत क्रांति दिवस के मौके पर इन शरणार्थियों ने लगाए हैं।
इस मौके पर मंडी शहर में भारत तिब्बत मैत्री संघ के बैनर तले चीन के खिलाफ आक्रोश रैली भी निकाली गई और चीन की दमनकारी नीतियों का जोरदार विरोध किया गया। मंडी में रह रही तिब्बती शरणार्थी व टीएसओ जम्यांग डोलमा ने कहा कि आज भी तिब्बत में मानवाधिकारों का हनन हो रहा है और तिब्बती संस्कृति को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है। यहां तक कि तिब्बती भाषा बोलने पर चीन लगाम लगाई जा रही है। वर्ष 1959 से चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया हुआ है और तब से वे चीन से अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रहें है। जब तक वे चीन के कब्जे से अपने देश को छुड़ा नहीं लेते उनका संघर्ष और चीन का विरोध जारी रहेगा। इस मौके पर भारत तिब्बत मैत्री संघ के उपाध्यक्ष विशाल शर्मा ने बताया कि 10 मार्च 1959 को तिब्बत की राजधानी ल्हासा में हजारों तिब्बतियों ने चीन के दमन के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन किया था। शर्मा ने बताया कि इसी दौरान धर्मगुरु दलाई लामा को अपने लगभग 80 हजार समर्थकों के साथ तिब्बत छोड़ भारत में शरण लेनी पड़ी थी।
इसके उपरांत सभी ने सेरी मंच पर एकत्रित होकर तिब्बत की आजादी के लिए बलिदान हुए शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। श्रद्धांजलि समारोह में नगर निगम मंडी के महापौर वीरेंद्र भट्ट भी विशेष रूप से मौजूद रहे। भट्ट ने इस मौके पर तिब्बत की आजादी में बलिदान हुए शहीदों के प्रति अपनी संवेदनाएं प्रकट करते हुए भगवान से जल्द से जल्द तिब्बत की आजादी की दुआ भी मांगी।
