भावना शर्मा: पूरे भारतवर्ष में विजयदशमी का पर्व बड़ी ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाते हुए देशभर में रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले जलाए जाते हैं। वहीं हिमाचल में भी इस पर्व को बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन एक हैरान कर देने वाली बात यह है कि हिमाचल के जिला कांगड़ा के बैजनाथ शहर में दशहरे का यह पर्व नहीं मनाया जाता और ना ही यहां पर रावण का पुतला जलाया जाता है। यह यूं ही नहीं है कि यहां के लोग दशहरा मनाना नहीं चाहते लेकिन इसके पीछे कई मान्यता और कहानियां जुड़ी हुई है जिनसे समय न्यूज़ आज आपको रूबरू करवाएगा।
धौलाधार की पहाड़ियों में बसा जिला कांगड़ा का शहर बैजनाथ जहां प्राचीन शिव मंदिर है । इस शिव मंदिर के चलते यह शहर विश्व भर में प्रसिद्ध है लेकिन इस शहर में दशहरे का पर्व वर्षों से नहीं मनाया जा रहा है इसके पीछे की वजह यह है कि यहां के लोगों की मान्यता है कि जो भी यहां दशहरा पर्व पर रावण का पुतला जलाता है उसके साथ कोई ना कोई अनहोनी घटना जरूर घटती है। या तो व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है या फिर उसे कोई और भारी नुकसान उठाना पड़ता है। यही वजह है कि वर्षों बाद भी यहां के लोग दशहरा पर्व नहीं मनाते हैं और ना ही रावण का पुतला यहां जलाया जाता है।
इस कथन को लेकर भी कई कहानियां जुड़ी हुई है जिन्हें यहां के स्थानीय लोग और मंदिर के पुजारी की कुछ इस तरह बयां करते है। बैजनाथ को भगवान शिव के भक्त रावण की तपोस्थली के रूप में देखा जाता है। चार वेदों के ज्ञाता शिव भक्त रावण ने बैजनाथ में ही भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की थी। यह वही स्थान है जहां पर रावण ने भगवान शिव की आराधना करते हुए उन्हें प्रसन्न करने के लिए अपने 10 सिरों की भेंट दी थी। रावण ने हवन कुंड में एक-एक करके अपने 10 सिर काट कर भगवान शिव को भेंट किए थे जिसके बाद भगवान शिव ने रावण की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे इस स्थान पर दर्शन दिए थे।
रावण की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने रावण को लंका कि धरती पर राज करने के लिए अद्वितीय शक्ति दी बल्कि ज्ञान का वरदान दिया और उसके सभी सिरों को पहले जैसा कर रावण को दशानन होने का भी वरदान प्रदान किया था। इसके बाद रावण ने भगवान शिव से लंका चलने का अनुरोध किया जिस पर भगवान शिव ने खुद को एक लिंग का रूप धारण कर रावण के साथ चलने को हामी भरी, लेकिन इसके पीछे भगवान शिव ने एक शर्त रावण के समक्ष रखी जिसमें उन्होंने रावण से इस शिवलिंग को रास्ते में जमीन पर ना रखने की बात कही। भगवान शिव ने रावण से कहा कि अगर रास्ते में इस शिवलिंग को तुम जमीन पर रखते हो तो यह शिवलिंग वहीं स्थापित हो कर अचल हो जाएगा और फिर तुम इस शिवलिंग को वहां से नहीं उठा पाओगे।
रावण प्रसन्न चित्त मन से शिवलिंग को हाथों में उठाकर लंका की तरफ जाने लगा, लेकिन रास्ते में उसे जब लघुशंका के लिए जाना था तो उसने यह शिवलिंग खेतों में काम कर रहे किसान के हाथों में यह कह कर थमाया कि वह इस शिवलिंग को जमीन पर ना रखें लेकिन रावण इस बात से अनभिज्ञ था कि जिस व्यक्ति को वह शिवलिंग थमा रहा है वह व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि किसान के भेष में स्वयं भगवान विष्णु है। रावण के जाते ही भगवान विष्णु ने इस शिवलिंग को जमीन पर रख दिया और यह शिवलिंग वहीं स्थापित हो गया आज उसी स्थान पर बैजनाथ शिव मंदिर स्थित है और वहां आज भी इस दिव्य शिवलिंग के दर्शन करने के लिए विश्व भर से लोग पहुंचते है। कहते हैं कि इस बैजनाथ मंदिर का निर्माण पांडवों की ओर से अपने अज्ञातवास के दौरान किया गया था, लेकिन इसको लेकर कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। इस मंदिर की शैली बहुत ही भव्य है और देखने से यह मंदिर पत्थरों की निकासी पर बना हुआ नज़र आता है। मंदिर का निर्माण बलुआ पत्थरों से किया गया है।
जिन्होंने दशहरा मनाया उनकी हो गई मौत
ऐसा नहीं है कि बैजनाथ में कभी दशहरा मनाने का प्रयास लोगों ने नहीं किया। 70 के दशक में बैजनाथ के ऐतिहासिक शिव मंदिर के बाहर स्थित मैदान में दशहरा मनाने का सिलसिला शुरू हुआ था,लेकिन रावण मेघनाद और कुंभकरण के पुतले बनाने से लेकर अन्य कार्यों में अहम भूमिका निभाने वाले प्रतिनिधियों के साथ दुर्घटना होने के बाद लोगों ने यहां दशहरा मनाने का विचार ही त्याग दिया। इस दौरान दो लोगों की मौत भी हो गई जबकि अन्य लोगों के साथ किसी ना किसी प्रकार की दुर्घटना घट गई जिसके चलते लोगों के अंदर एक डर और मान्यता बन गई कि जो भी यहां दशहरा मनाएगा या रावण का पुतला जलाएगा तो उसे बड़ा नुकसान झेलना पड़ेगा।
नहीं है कोई भी सुनार की दुकान दुकान
बैजनाथ में दशहरा ना मनाना ही एक अनोखी बात नहीं है बल्कि एक और अनोखा तथ्य यहां यह है कि बैजनाथ के बाजार में कोई भी सुनार की दुकान आपको देखने के लिए नहीं मिलेगी। इस बाजार में कोई भी व्यक्ति सुनार की दुकान नहीं खोलता है। इसके पीछे की मान्यता भी यही है कि अगर कोई यहां सुनार की दुकान खोलता है तो उसे भारी नुकसान झेलना पड़ता है या फिर दुकान ही आग की भेंट चढ़ जाती है। इस शहर से दो किलोमीटर दूरी पर है पपरोला जगह है वहीं पर सभी सुनारों की दुकानें खोली गई है।
हवन कुंड के साथ ही अभी भी मौजूद है रावण के पद चिन्ह
जिस स्थान पर रावण ने तपस्या की और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए जिस हवन कुंड में अपने 10 सर की बलि दी थी वह हवन कुंड आज भी बैजनाथ मंदिर में सामने की तरफ देखा जा सकता है। इसके साथ ही बैजनाथ से कुछ दूरी पर ही रावण के पदचिन्ह भी नजर आते हैं, जहां पर स्थानीय लोगों की ओर से मंदिर की स्थापना की गई हैं।
