बिलासपुर/सुभाष ठाकुर: शारदीय नवरात्रि के चलते मां नैना देवी के दर में हर रोज सैकड़ों श्रद्वालुओं का तांता लगा रहता है। ऐसे में कोविड-19 की गाइडलाइन को पूरा करते हुए श्रद्वालुओं को माता के दर्शन करवाए जा रहे हैं। यहां नवरात्रि के दौरान हजारों लोगों ने माता के दर्शन किए। नैना देवी मंदिर में हवन कुंड और पवित्र ज्योतियां यहां की खासियत मानी जाती है। आंधी, तूफान, बारिश के दौरान अकसर मंदिर में दिव्य ज्योतियां प्रज्ज्वलित होती हैं। यह ज्योतियां पीपल के पत्तों, झंडों यहां तक की भक्तों की हथेलियों तक आ जाती हैं।
हवन कुंड में समाहित हो जाती है विभूति
नैना देवी मंदिर में एक ऐसा हवन कुंड है जिससे हवन एवं यज्ञ से उत्पन्न होने वाली विभूति को बाहर नहीं निकाला जाता। हवन इसी कुंड में समाहित हो जाता है और अपने आप ही साफ हो जाता ह। कहा जाता है कि 500 वर्ष पुराना यह हवन कुंड है, जिसमे विभूति बाहर नही निकाली जाती है। आज तक कि किसी भी श्रद्वालु के इस हवन कुंड में माथा न टेकने पर उसकी यात्रा सफल नहीं मानी जाती है।
मां भवानी ने गुरू गोबिंद सिंह को दिए थे
सिक्खों के दसवें गुरु गोबिंद सिंह ने भी यहां तपस्या व हवन किया था। उनकी तपस्या से खुश होकर मां भवानी ने गुरू गोबिंद सिंह को दर्शन दिए और उन्हें तलवार भेंट की। साथ ही उन्हें विजयी होने का वरदान दिया था। मां का आशीर्वाद पाकर उन्होंने मुगलों को पराजित किया था। कहा जाता है कि आनंदपुर साहिब की ओर जाने से पहले गुरु गोबिंद सिंह ने अपने तीर की नोक से तांबे की एक प्लेट पर अपने पुरोहित को हुक्मनामा लिखकर दिया, जो आज भी नैना देवी के पंडित के पास सुरक्षित है। ऐसी भी मान्यता है कि जिस समय महिषासुर राक्षस और नैना देवी के बीच युद्ध होने पर मां ने उसे वरदान दिया कि मेरे हाथों मृत्यु होने के कारण तू एक क्षण के लिए भी मेरे चरणों से अलग नहीं होगा, जहां मेरा पूजन होगा वहां पर तुम भी पूजे जाओगे। तब से यहां माता जगदंबा भी विरामजान है। यह स्थान एक सिद्ध पीठ के नाम से भी जाना जाता है।
इसलिए पड़ा यहां का नाम नैना देवी
कथाओं के अनुसार, देवी सती ने खुद को यज्ञ में जिंदा जला दिया, जिससे भगवान शिव व्यथित हो गए। उन्होंने सती के शव को कंधे पर उठाया और तांडव नृत्य शुरू कर दिया। इससे स्वर्ग में सभी देवता भयभीत हो गए। इस पर उन्होंने भगवान विष्णु से अपने चक्र से सती के शरीर को 51 टुकड़ों में काटने का आग्रह किया। भगवान विष्णु के सती के शरीर को काटने पर उनकी आंखे इस जगह पर गिरी थी। जिसके बाद से ही यहां का नाम नैना देवी पड़ा।

