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इलाके में फैली महामारी से जुड़ा हैं पालमपुर के होली मेले इतिहास, 19वीं सदी से आज तक निभाई जा थी परंपरा

admin
admin 5 Min Read
Updated 2023/02/28 at 6:21 PM
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भावना शर्मा: हिमाचल प्रदेश में क़ई जगहों पर होली पर्व पर मेलों का आयोजन किया जाता हैं। इसी तरह के एक मेले का आयोजन जिला कंगड़ा के पालमपुर में भी होता हैं। यहां होली मेले का आयोजन वर्षों से होता आ रहा है बस अब समय के साथ इसका स्वरूप बदल गया हैं और इस मेले ने एक बड़ा रूप ले लिया हैं। वैसे भी पालमपुर ही होली की एक ओर खास बात यह भी हैं कि यहां लोग एक दिन पहले ही होली का पर्व मना लिया जाता हैं। इसी के साथ यहां होली मेले का भी आयोजन होता हैं। पालमपुर की इस होली से यहां का समृद्ध इतिहास भी जुड़ा हुआ हैं। यहां होली का इतिहास 19वीं सदी की घटना से जुड़ा हुआ हैं।
यह हैं होली मेले से जुड़ा इतिहास
पालमपुर में मनाए जाने वाले होली मेले के पीछे लोग 19वीं सदी की एक घटना जिक्र करते हैं। क्षेत्र के  बुजुर्गों के अनुसार 19वीं सदी में क्षेत्र में चेचक के रोग
ने भयानक रुप से पांव पसार लिए थे। चिकित्सा के अभाव में यह रोग बढ़ता गया और अनेक लोग असमय ही मौत का ग्रास बन गए। कोई हल न निकलता देख दुखी लोग घुग्गर में कुटिया में रहने वाले बाबा शिवगिरी महाराज के पास पहुंचे व उनसे समस्या का समाधान करने की विनती की। लोगों के अनुसार उस समय होली का अवसर था व बाबा ने मां काली की झांकी बना उसकी क्षेत्र में परिक्रमा करने
की सलाह दी।
बाबा कि सलाह के अनुसार लोगों ने वैसा ही किया व आश्चर्यजनक तौर पर बीमारी से राहत मिल गई। इससे
लोगों में आस्था बढ़ गई व होली के अवसर पर मेले का आयेाजन और होली के दिन मां काली की झांकी निकाले जाने की परंपरा का आगाज का हो गया। अब यह परंपरा यहां 19 फ़ीसदी से लगातार निभाई जा रही हैं। यहां तक कि लोगों ने बाबा शिवगिरी महाराज जिस कुटिया में रहते थे उस स्थान पर कालीबाड़ी मंदिर भी बनाया हैं। समय के साथ मेले के आयोजन में काफी बदलाव आया हैं पर नहीं बदली हैं तो झांकियों को निकाले जाने की प्रथा।
मेला बंद हुआ तो फिर फैल सकता हैं भयंकर बीमारी का प्रकोप 
पालमपुर में होली मेला आज भी उसी हर्ष ओर उल्लास के साथ मनाया जाता है जिस तरह से सदियों पहले मनाया जाता था इसके पीछे की एक वजह यह भी मानी जाती है कि बाबा शिवगिरी ने समाधि लेने से पूर्व क्षेत्र के लोगों को कहा था कि यदि होली के अवसर पर मेले का आयोजन बंद किया गया तो क्षेत्र में किसी भयानक बीमारी का प्रकोप होगा। बाबा शिवगिरी के आदेशानुसार पालमपुर में होली मेले की शुरुआत की गई थी जो दो सदियों बाद भी जिंदा है।
झंडा चढाने के बाद झांकियां निकालने से किया जाता है होली मेले का आगाज
माता दी के पालमपुर में राज्य स्तरीय होली मेले का आगाज करने से पहले ही मां काली के मंदिर में झंडा चढ़ाया जाता हैं। इसके बाद होली मेले का आगाज घुग्गर के कालीबाड़ी मंदिर से निकाली जाने वाली भगवान श्रीगणेश की झांकी से किया जाता हैं। इसके बाद तीन स्थानों से पहले दिन एक-एक, दूसरे दिन दो-दो, तीसरे दिन तीन-तीन व अंतिम दिन एक-एक झांकी आज भी निकाली जाती हैं। इसके साथ ही बदलते परिवेश में अब अनेक तरह की प्रतियोगिताएं व शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी मेले में किया जाता हैं, जिसमें पहाड़ी व अन्य प्रदेशों की संस्कृति की झलक लोगों को देखने को मिलती हैं।
राज्यस्तरीय होली मेले का मिला हैं दर्जा
कुछ वर्षों पहले पालमपुर में मनाए जाने वाले होली मेले के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए इसे राज्यस्तरीय मेले का दर्जा प्रदान कर सरकार कि ओर से सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाने लगी हैं।
TAGGED: 19th century, area, epidemic, followed, Holi fair, palampur, tradition
admin February 28, 2023
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