राहुल चावला, शाहपुर: जाने-अनजाने में कई मर्तबा समाज की कई कड़ियां खुद ही अपराधिक गतिविधियों को जन्म देती हैं और अपराध बोध न होने के कारण ये घटनाएं निरंतर घटती ही चली जाती हैं। मगर पहली मर्तबा स्कूली छात्रों ने जिस कदर समाज को जागृत करने का काम किया हैं ये अपने आप में काबिले तारीफ हैं। दरअसल कांगड़ा हिमाचल प्रदेश का मैदानी जनपद भी हैं।यहां हजारों एकड़ जमीन पर रबी और ख़रीफ की फ़सलें उगाई जाती हैं, जिनमें तिलहन फसलें भी शामिल हैं, तिलहन फसलों के पक जाने के बाद किसान इन्हें परंपरागत तरीके से या मशीनों में ले जाकर बीजों को निकालने की बजाय, बड़े ही सुनियोजित और नायाब तरीके के तहत इनके सूखे हुए पौधों को अब खुली सड़कों के दोनों और कतारों में बिछा देतें हैं।
नतीजतन दिनभर सैकड़ों वाहन इन पौधों से होकर गुजरते हैं जिससे पौधों से पका हुआ बीज झड़कर बटोरने लाइक हो जाता हैं। इस प्रोसेस में किसानों की न हींग लगती न फिटकरी और रंग चोखा निकल आता है, हालांकि ऐसा करने वाले किसानों के दिलो-दिमाग में ये कभी नहीं आता, कि इससे वाहन चालकों को भी कोई तकलीफ होती होगी, ख़ास तौर पर दो पहिया वाहन चालकों के लिए। बावजूद इसके ख़ास सीज़न में ये काम सालों से निरंतर होता चला आया है और इस पर न किसी की नजर जाती है और न कानून स्वयं से कोई फैसला लेता हैं, मगर हाल ही में केंद्रीय विद्यालय गोहजू के बच्चों ने इसका ध्यान सभी की ओर आकर्षित किया हैं। दरअसल केवी के छात्रों को सुबह शाम उनके पेरेंट्स छोड़ने आते हैं तो कई मर्तबा उनके दो पहिया वाहन स्किड हुए हैं।
कई बार तो स्थिति इतनी नाजुक हुई है कि घटना का शिकार हुएर लोगों को समय पर उपचार न मिलता तो जान तक जा सकती थी। स्कूली छात्रों ने इसकी शिकायत अपने स्कूल के अध्यापकों से की तो अध्यापकों ने केंद्रीय विद्यालय गोहजू की प्रिंसिपल के सहयोग से स्कूल से लेकर उन तमाम लिंक रोड्स से रैली निकाली जहां किसानों ने अपने पौधों को सड़कों पर बिछा रखा था। मौके पर मौजूद किसानों को छात्रों ने जहां उन्हें ऐसा न करने के कई कारण गिनवाकर उन्हें जागरूक किया, बल्कि उन घटनाओं से भी अवगत करवाया, जिसकी वजह जाने-अनजाने में ही सही मगर ये वही किसान थे जिन्होंने अपनी पकी हुई फसल को इस कदर सड़कों पर बिछा रखा था।हालांकि किसान इस दौरान सिर्फ कुछ दिनों की ही तो बात है ऐसा कहते हुए नजर आए। मगर जब बच्चों और अध्यापकों ने कहा कि मौत के लिए तो महज चंद सैकेंड ही काफी हैं तो ये सुनकर किसानों ने दोबारा ऐसा न करने का प्रण लेते हुए तुरंत अपनी फसल को मौके से उठाना भी शुरू कर दिया।
हैरत तो ये है कि जो काम कानून के नुमाइंदों को स्वयं हस्तक्षेप करके करना चाहिए था वो आज दिन तक नहीं हो पाया। मगर स्कूली छात्रों ने महज रैली निकालकर न केवल किसानों को जगाने का काम किया बल्कि जाने-अनजाने में इन किसानों की ओर से किए जाने वाले अपराध से भी उन्हें बचा लिया। स्कूल के अध्यापक सेवा सिंह ने कहा कि वो भी इन्हीं सड़कों से आवाजाही करते हैं, कई बार किसानों को समझाया भी मगर वो उनकी बात सुना-अनसुना कर देते थे। मगर आज जब बच्चों ने रैली निकाली तो उन्हें इसका लाभ मिला। प्रिंसिपल नमिता चौधरी ने बताया कि हालांकि किसानों की भी मजबूरी रहती है मगर मौत का कोई ठिकाना नहीं होता वो कभी भी किसी भी रूप में आ सकती है, जिसके जिम्मेवार कहीं न कहीं ऐसा काम करने वाले किसान हो सकते हैं,जिसका उन्हें रति भर भी बोध नहीं होता। मगर आज स्कूली छात्रों ने उन्हें उनके अपराध बोध का ज्ञान करवाकर अब ऐसा न करने के लिए प्रेरित किया हैं। वहीं स्कूली छात्रा आराध्या ने बताया कि पहले तो किसानों ने अपनी फसल को हटाने से न-नुकर की मगर जब उन्हें इसके परिणामों से अवगत करवाया तो वो तुरंत मान गए और भविष्य में ऐसा न करने की भी बात कही
