संजीव महाजन,नूरपूर : हिमाचल के नूरपुर में लगने वाले राज्यस्तरीय जन्माष्टमी मेला 90 दशकों से चला आ रहा है। छोटे से स्तर पर इसकी शुरुवात एक शख्स ने की ओर आज इस मेले ने राज्यस्तरीय रूप ले लिया है। श्रीवृज राज स्वामी मंदिर नूरपुर में श्री कृष्ण जन्माष्टमी के उपलक्ष्य पर श्रदालुओं के लिए कुछ फलाहार लगाने की सोच से इस जन्माष्टमी महोत्सव का आगाज़ हुआ। शुरुआत 5 किलो आलू के स्टॉल से हुई,लेकिन श्रदालुओं को इस शख्स के स्टाल में कोई रुचि नहीं थी, जन्माष्टमी में लगाया गया 5 किलो का आलू का स्टॉल जस का तस रहा ओर कोई यहां स्टॉल पर नहीं पहुंचा। इसके बाद भी शख्स का जज़्बा कम नहीं हुआ और अगले साल फिर से जन्माष्टमी के उपलक्ष्य पर इस शख्स ने 20 किलो आलू के साथ दूध का स्टॉल भी लगा दिया। उस दिन उस शख्स के दोनों स्टालों पर श्रद्धालु भी उमड़े ओर दूध और आलू भी उन्होंने खाया। ये शख्सियत कोई और नहीं बल्कि जननायक एवं समाजसेवी स्व राकेश महाजन थे।
समय बिता ओर राकेश महाजन का एक स्टॉल कई सस्टॉलों में तबदील हो गया और आज यह एक विशाल लंगर का रूप ले चुका है। विशाल लंगर के बाद जन्माष्टमी को मेले का रूप देने के लिए राकेश महाजन ने बाहरी राज्यों से झूले मंगवाना शुरू किए। राकेश महाजन किला ग्राउंड में मेले का आयोजन करने के लिए अपनी जेब से बिना किसी सरकारी मदद से पुरातत्व विभाग को 25 हजार रुपए प्रति दिन के जमा करवाते थे। जब नूरपुर की जन्माष्टमी ने एक मेले का रूप ले लिया तो नूरपुर क्षेत्र व दूर दराज के लोग भी जन्माष्टमी मेले में पहुंचने शुरू हुए। आज यह मेला नूरपुर का सबसे बड़ा उत्सव बन चुका है जिसे सरकार ने राज्य स्तरीय मेले का दर्जा दे दिया है।
राकेश महाजन के समाज के लिए दिए गए इस योगदान को देखते हुए ही नगर परिषद परिसर में उनकी प्रतिमा बनाई गई है जिसका अनावरण राज्यपाल की ओर से किया गया है। राकेश महाजन भले ही आज नहीं है लेकिन उनका परिवार इस परंपरा का निर्वहन कर रहा है और हर साल जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन धूमधाम से करता है।
