भावना शर्मा: आज के इस आधुनिक युग में स्कूलों से टाट पट्टी गुम होकर छात्रों को बैठने के लिए डेस्क की सुविधा मिलती हैं। वहीं पुस्तकालयों में भी छात्रों को कुर्सी और मेज पर ही किताबें पढ़ने और ज्ञान अर्जित करने की सुविधा दी जा रही हैं। अब टाट पट्टी पर जमीन पर बैठकर ज्ञान अर्जित करने या स्कूलों में पढ़ाई करने की परंपरा जहां खत्म हो चुकी हैं,तो वहीं राजधानी शिमला का एक पुस्तकालय अभी भी इस परंपरा का निर्वहन कर रहा हैं। जी हां शिमला में बने इस पुस्तकालय में आपको बैठने के लिए कोई कुर्सी मेज उपलब्ध नहीं होगा बल्कि आपको जमीन पर बैठकर ही यहां किताबें पढ़ ज्ञान अर्जित करना होगा।
शिमला के चौड़ा मैदान स्थित राज्य संग्रहालय के इस पुस्तकालय में आज भी पुरानी परंपरा यानी प्राचीन गुरुकुल परंपरा का निर्वहन किया जा रहा हैं। यहां ना केवल छात्रों को जमीन पर बैठकर किताबों को पढ़ने की आज्ञा है बल्कि उन्हें इस पुस्तकालय में प्रवेश भी नंगे पांव दिया जाता हैं। छात्र अपने जूते पहनकर शिक्षा रूपी इस मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते। यहां विशेष रूप से जूट की पुलें पुस्तकालय के बाहर रखी गई हैं, जिन्हें पहनकर छात्र इस पुस्तकालय में प्रवेश करते हैं।
इस परंपरा के निर्वहन के पीछे की भी एक खास वजह है वह यह है कि इस पुस्तकालय का निर्माण जिस पद्धति पर किया गया है उसे पद्धति में ज्ञान जमीन पर बैठकर और नंगे पांव ही प्राप्त किया जाता हैं। राज्य संग्रहालय के इस पुस्तकालय को बौद्ध भिक्षु के मठ की तरह तैयार किया गया हैं। यही वजह है कि यहां मठ की परंपरा और वहां के नियमों की पूरी-पूरी अनुपालना भी की जा रही हैं। जिस तरह से बौद्ध भिक्षु अपने मठों में नंगे पांव जमीन पर बैठकर अपना ध्यान और पाठ करते हैं, उसी तरह से इस पुस्तकालय में भी छात्र अपने जूते पुस्तकालय के बाहर खोल कर ज़मीन पर बैठकर अध्ययन करते हैं।
पुस्तकालय में अध्ययन करने के लिए आने वाले छात्रों और पाठकों को भी यहां की व्यवस्था खूब लुभाती है इस पुस्तकालय का माहौल जहां मठ क़ई शांतिपूर्ण हैं ,तो वहीं पाठकों को यहां इस तरह की किताबों का अध्ययन करने को मिलता है, जो किसी दूसरे पुस्तकालय में नहीं मिल पाता हैं। इस पुस्तकालय में आज भी पुरानी परंपराओं का निर्वहन हो रहा हैं जो यहां आने वाले शोधकर्ताओं और छात्रों को बेहद पंसद आता हैं। पुस्तकालय में इतिहास से जुड़ी किताबों के साथ ही यात्रा वृतांत, पुरातत्व, कला और हिमाचली इतिहास और धर्म से जुड़ी किताबों का बहुमूल्य संग्रहण उपलब्ध हैं।
शिमला राज्य संग्रहालय के उच्च अधिकारी हरि सिंह चौहान ने कहा कि इस पुस्तकालय की खासियत है कि इसे जिस पैटर्न पर तैयार किया गया हैं। इसके साथ ही इस पुस्तकालय में किताबों का ऐसा संग्रह है जो हिमाचल के किसी और पुस्तकालय में नहीं हैं। पुस्तकालय में भारतीय कला के अलावा रशियन, ग्रीक, चाइनीज, जैपनीज आर्ट से जुड़ी किताबों का संग्रहण हैं जो शोधकर्ताओं के लिए बेहद फायदेमंद हैं।
किन्नौर के कारीगरों ने पूरी परंपराओं का निर्वहन करते हुए किया हैं पुस्तकालय का निर्माण
यह पुस्तकालय ना केवल अपनी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है बल्कि इस पुस्तकालय के निर्माण के पीछे की कहानी भी बेहद रोचक है पुस्तकालय का निर्माण किन्नौर के कारीगरों के हाथों से ही किया गया हैं।पुस्तकालय का निर्माण 2012 में शुरू हुआ था और 2014 में यह बनकर तैयार हो गया था। जब कारीगर इस पुस्तकालय का निर्माण कर रहे थे तो उन्होंने भी बौद्ध धर्म से जुड़ी सभी परंपराओं का निर्वहन किया था जब तक पुस्तकालय का निर्माण नहीं हुआ जब तक उन्होंने अपनी दाढ़ी नहीं बनाई थी और इसके साथ ही कुछ अन्य परंपराओं का भी निर्वहन उन्होंने किया था।
पुस्तकालय के निर्माण में दिखती हैं बौद्ध संस्कृति की झलक
राज्य संग्रहालय के इस पुस्तकालय के के निर्माण कार्य में भी बौद्ध संस्कृति की झलक देखने को मिलती हैं। यह पुस्तकालय पूरी तरह से लकड़ी इस्तेमाल से तैयार किया गया हैं पुस्तकालय के दरवाजे से लेकर पुस्तकालय के भीतर तक की सजावट बौद्ध मठों की तरह की गई हैं। पुस्तकालय के दरवाजे पर आठ बौध संस्कृति के प्रतिरूप में उकेरे गए हैं। वहीं, अंदर की सजावट भी बौद्ध मठों की तरह की गई हैं। दरवाजे पर जहां ड्रैगन बने हैं, वहीं फूल, पत्तों के साथ ही अन्य कई प्रतीक इस पर बनाए गए हैं। पुस्तकालय के प्रवेश द्वार पर जहां बौद्ध संस्कृति से जुड़े ड्रैगन और कमल का फूल, पत्तों की बेहद ही सुंदर नक्काशी की गई है, तो वहीं अंदर बैठ कर अध्ययन करने के लिए जो चौखतान बनाए गए है उनपर भी बेहद ही सुंदर नक्काशी की गई हैं।
