चंद्रिका – हिमाचल को देवभूमि यू ही नही कहते, यहां पर हर जगह देवी देवता के मंदिर स्थापित है जिन पर लोगों की अपार श्रद्धा है। हिमाचल का सोलन शहर भी एक ऐसा शहर है जो शूलिनी माता के नाम पर बसा है।
सोलन की अधिष्ठात्री देवी शूलिनी माता के नाम से ही शहर का नाम सोलन पड़ा, जो देश की स्वतंत्रता से पूर्व बघाट रियासत की राजधानी के रूप में जाना जाता था। यहां का नाम बघाट भी इसलिए पड़ा क्योंकि रियासत में 12 स्थानों का नामकरण घाट के साथ था। माना जाता है कि बघाट रियासत के शासकों ने यहां आने के साथ ही अपनी कुलदेवी शूलिनी माता की स्थापना सोलन गांव में की और इसे रियासत की राजधानी बनाया।
हर वर्ष मनाया जाता है यहां जिला स्तरीय शूलिनी मेला
सोलन जिला के अस्तित्व में आने के बाद इसका सांस्कृतिक महत्व बनाए रखने और पर्यटन दृष्टि से बढ़ावा देने के लिए राज्यस्तरीय शूलिनी मेला होता है। ये मेला तीन दिनों तक आयोजित होता । सोलन की अधिष्ठात्री देवी मां शूलिनी मेले के पहले दिन पालकी में बैठकर अपनी बड़ी बहन मां दुर्गा से मिलने पहुंचती है। दो बहनों के इस मिलन के साथ ही राज्य स्तरीय मां शूलिनी मेले का आगाज हो जाता है। मां शूलिनी अपने मंदिर से पालकी में बैठकर शहर की परिक्रमा करने के बाद गंज बाजार स्थित अपनी बड़ी बहन मां दुर्गा से मिलने पहुंचती है। मां शूलिनी तीन दिनों तक लोगों के दर्शानार्थ वहीं विराजमान रहती है। मेले में तीनों दिन विभिन्न तरह की खेलकूद प्रतियोगिताएं, कुश्ति व सांस्कृतिक संध्याएं लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र रहती है।
मां शूलिनी की सोलन शहर पर आपार कृपा
माता शूलिनी दुर्गा माता का ही अवतार है। माता का नाम शूलिनी इसलिए पड़ा, क्योंकि माता त्रिशूल धारी है। उनके अनुसार माता शूलिनी सोलन में बघाट रियासतों के राजाओं के समय से बसी है। जब बघाट रियासत के राजा सोलन में बसे थे, तो वो मां शूलिनी को अपने साथ ही सोलन लेकर आए थे। कहा जाता है कि माता शूलिनी बघाट रियासत के राजाओं की कुलदेवी थी और उनके हर कामों को पूर्ण करने वाली थी, तब से लेकर आज तक मां शूलिनी की सोलन शहर पर आपार कृपा है। मान्यता है कि माता शूलिनी के प्रसन्न होने पर क्षेत्र में किसी प्रकार की प्राकृतिक आपदा या महामारी का प्रकोप नहीं होता है, बल्कि सुख-समृद्धि व खुशहाली आती है।
