नूरपुर, संजीव -: क्षेत्रीय बागवानी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र (RHRTS), जाच्छ ने हाल ही में कृषि और बागवानी अधिकारियों के लिए बांस की खेती और इसके व्यावसायिक उपयोग को लेकर पाँच दिवसीय प्रशिक्षण आयोजित किया। यह कार्यशाला 9 से 13 मार्च 2026 तक चली और इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में बांस आधारित उद्योगों और आय के साधनों को मजबूत करना था।
भारत बांस उत्पादन में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। देश में लगभग 1.60 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बांस की खेती होती है। बांस को न केवल ग्रामीण आजीविका के लिए बल्कि निर्माण, रेयॉन, प्लाईवुड, लुगदी और बायोचार जैसे उद्योगों में भी एक महत्वपूर्ण नवीकरणीय संसाधन माना जाता है। भारत सरकार ‘राष्ट्रीय बांस मिशन’ के तहत इसकी खेती को बढ़ावा दे रही है। इस मिशन के तहत डॉ. वाई.एस. परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी (सोलन) द्वारा विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।कार्यशाला में डॉ. विपन गुलरिया, सह निदेशक, बागवानी अनुसंधान केंद्र, जाच्छ ने बताया कि भारत में बांस का वैश्विक स्तर पर दूसरा सबसे बड़ा आनुवंशिक भंडार है, जिसमें 22 वंश और 136 से अधिक प्रजातियाँ शामिल हैं। इनमें से 11 प्रजातियाँ विदेशी मूल की हैं। बांस उत्पादन वाले प्रमुख राज्य अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिमी घाट हैं। हिमाचल प्रदेश में बांस की खेती सीमित है और यह राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग 3 प्रतिशत ही है।
डॉ. रोहित विशिष्ट, प्रधान वैज्ञानिक, बायोस्फीयर टेक्नोलॉजी सेंटर, पालमपुर ने बताया कि हिमाचल प्रदेश में आठ बांस प्रजातियाँ पाई जाती हैं। प्रमुख प्रजातियों में डेन्ड्रोकैलेमस हैमिल्टोनी, बी. न्यूटन्स और डेन्ड्रोकैलेमस स्ट्रिक्टस शामिल हैं। बांस का बाजार लगभग ₹1.2 लाख करोड़ का अनुमानित है, जो ग्रामीण, पिछड़े और आदिवासी क्षेत्रों के लिए आजीविका का बड़ा स्रोत है।कार्यशाला में यह भी बताया गया कि ‘राष्ट्रीय बांस मिशन’ वन क्षेत्रों के बाहर बांस की खेती को बढ़ावा देता है, और ‘भारतीय वन अधिनियम’ में संशोधन के बाद गैर-वन भूमि पर उगने वाले बांस को अब “वृक्ष” की श्रेणी से हटा दिया गया है। इससे बांस की खेती और परिवहन आसान हुआ है।क्वांटम पेपर मिल के बांस विशेषज्ञ डॉ. सुधीर शर्मा ने कहा कि लुगदी उद्योग में बांस की वार्षिक आवश्यकता 30 लाख मीट्रिक टन है, जबकि उपलब्धता केवल 20 लाख मीट्रिक टन है। इस कमी को पूरा करने के लिए भारत को बांस आयात करना पड़ता है। यदि उत्पादकता बढ़ाई जाए तो ग्रामीण क्षेत्रों में यह स्थिति बदल सकती है।
बांस कार्बन सोखने वाला सबसे तेज़ पौधा है और इसका उपयोग कागज़, पल्प, प्लाईवुड और निर्माण कार्यों में होने पर पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इंडस्ट्री में हरे बांस की औसत कीमत लगभग ₹5000 प्रति टन है, लेकिन किसानों को केवल ₹1300–2000 प्रति टन मिलते हैं। इसे सुधारने के लिए बाज़ार और सरकारी नियमों में सुधार की आवश्यकता है।मृदा वैज्ञानिक डॉ. रेनू कपूर ने बताया कि बांस से बने बायोचार का उपयोग पानी से जुड़ी इंडस्ट्री, कॉस्मेटिक्स, कृषि पोषण और कार्बन संधारण के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर किया जा सकता है। RHRTS, जाच्छ में जल्द ही बांस बायोचार प्लांट स्थापित किया जाएगा, जिससे किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य मिलने में मदद मिलेगी।
यह प्रशिक्षण कार्यशाला न केवल अधिकारियों को तकनीकी जानकारी प्रदान करने के लिए थी, बल्कि हिमाचल प्रदेश में बांस आधारित उद्योगों और ग्रामीण आजीविका के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
