भावना,शिमला: हिमाचल प्रदेश में भारी बारिश के चलते आई आपदा ने प्रदेशवासियों को कभी ना भूलने वाले जख्म दिए हैं। इस आपदा के चलते जहां सैकड़ो लोगों ने अपनी जान गवां दी हैं, तो वहीं सैकड़ो लोग बेघर हो गए हैं। प्रदेश की राजधानी शिमला भी इस आपदा से अछूती नहीं रही हैं। इस आपदा ने राजधानी शिमला में 20 से अधिक लोगों की जान ले ली है तो वहीं अब शिमला के सबसे पुरानी ओर ऐतिहासिक इमारत पर भी इस आपदा का खतरा लगातार मंडरा रहा हैं। शिमला के बालूगंज में स्थित इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडी का ऐतिहासिक भवन इस आपदा की वजह से खतरे की जद में आ गया हैं।
14 अगस्त को शिमला में हुई भारी बारिश की वजह से शिव मंदिर समरहिल में जो हादसा हुआ था उसकी शुरुवात भी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी के भवन परिसर की पिछली तरफ बादल फटने से हुई थी। यहां बादल फटने से भारी मलबा,भारी भरकम पेड़ो को साथ लेकर शिव मंदिर की और बढ़ा था जिसने शिव मंदिर को तबाह करने के साथ ही यहां पूजा कर रहे लोगों की जिंदगियां भी लीन ली। इस घटना के बाद से एडवांस स्टडी के परिसर में भी दरारें देखी गई हैं और यहां एडवांस स्टडी के एंट्री गेट के पास जमीन धंसने से लगातार खतरा भवन को भी बढ़ता जा रहा हैं। हालांकि कहा यह भी जा रहा हैं कि भवन में किसी तरह की कोई बड़ी दरारें नहीं आई हैं लेकिन भवन परिसर में जमीन धंसने के चलते आ रही दरारों को लेकर अब संस्थान प्रबंधन भी सतर्क गया है और इसकी वजह से मूल भवन को भी खतरा पैदा होने के आशंका बनी हुई हैं।
इस ऐतिहासिक भवन और इसके परिसर को बचाने को लेकर कवायद संस्थान प्रबंधन की ओर से शुरू कर दी गई हैं एक और जहां संस्थान के लॉन और परिसर में आई दरारों को भरने का काम किया जा रहा हैं। वहीं ऐतिहासिक भवन को सुरक्षित रखा जा सके इसके प्रबंधन की ओर से केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को पत्र भी लिखा गया हैं।
1888 में बनकर तैयार हुआ था इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडी
बता दें कि इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडी एक ऐसा भवन है जो ब्रिटिश कालीन इतिहास को अपने भीतर संजोए हुए हैं। इस भवन का निर्माण ब्रिटिश कालीन समय में 1884 में शुरू हुआ था और 1888 में यह बनकर तैयार हो गया था। जब यह भवन बनकर तैयार हुआ तो यहीं से अंग्रेजी हुकूमत चला करती थी ओर उस समय के वायसराय इस भवन में रहा करते थे। ब्रिटिश कालीन समय में तेरह वायसराय यहां पर रहे थे। वहीं आजादी के बाद इस भवन को राष्ट्रपति निवास बनाया गया। इसके बाद जब राष्ट्रपति शिमला आते थे तो इसी भवन में रुका करते थे। 1947 से 1965 तक यह भवन राष्ट्रपति निवास रहा, लेकिन 1965 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एस राधाकृष्णन ने इस संस्थान को उच्च अध्ययन के लिए समर्पित करते हुए इसे राष्ट्रपति निवास से बदलकर भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के रूप में परिवर्तित कर दिया। तब से लेकर अब तक यह संस्थान शोध और शिक्षा के लिए भारतवर्ष में अपनी एक अलग पहचान बनाए हुए हैं।
इसी भवन में हुआ था भारत पाकिस्तान को अलग करने का निर्णय
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी ना केवल ब्रिटिश कालीन इतिहास को अपने भीतर संजोए हुए हैं बल्कि भारत की आजादी से जुड़े हुए कई महत्वपूर्ण फैसले भी इसी भवन में लिए गए जिनकी गवाही आज भी यह भवन देता हैं। आजादी के समय वर्ष 1945 में हुए शिमला सम्मेलन और पाकिस्तान व पूर्वी पाकिस्तान को भारत से अलग करने के निर्णय सहित कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक निर्णय यहीं इसी भवन में लिए गए थे। स्वतंत्रता के बाद, यह वास्तुशिल्प चमत्कार भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति के हाथों में आ गया और इसका नाम बदलकर राष्ट्रपति निवास कर दिया गया। बाद में, कुछ वर्षों के बाद, इसे उच्च शिक्षा के केंद्र में बदल दिया गया।
भवन का इतिहास और वास्तुकला पर्यटकों के लिए है आकर्षण का केंद्र
इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडी का यह भवन वर्तमान में जहां एक शोध केंद्र के रूप में कार्य कर रहा,तो वहीं पर्यटकों के लिए भी यह भवन हमेशा से ही आकर्षण का केंद्र रहा हैं। इसके पीछे की वजह इस भवन का इतिहास है तो वहीं इसकी अद्भुत वास्तु कला भी है जिसके प्रति पर्यटक हमेशा से ही आकर्षित रहे हैं। भारतीय उन्नत अध्ययन संस्थान, शिमला की वास्तुकला ब्रिटिश आर्किटेक्ट हेनरी इरविन की ओर से डिज़ाइन कि गई हैं।इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी में एक आश्चर्यजनक विक्टोरियन शैली की वास्तुकला हैं जो पहली नज़र में पर्यटकों का दिल जीत लेती हैं। इसे भूरे पत्थरों और विदेशी बर्मी सागौन से बनाया गया है जो इस प्राचीन इमारत को एक अलग ही रूप देता हैं। हर साल जहां लाखों की संख्या में देशी और विदेशी पर्यटक इस भवन को देखने और इसके आसपास की प्राकृतिक सुंदरता को निहारने के लिए यहां पहुंचते हैं।
