विकास शर्मा, चिंतपूर्णी: सबने गुरबत में मुझको छोड़ दिया, इक मेरी बेकसी (विवशता) नहीं जाती। शायर बेदम शाह वारसी ने यह पंक्तियां जाने किन परिस्थितियों में लिखी होंगी, लेकिन वर्तमान में डूहल बंगवालां गांव के सुरेंद्र के जीवन में यह एक-एक शब्द शत-प्रतिशत सही उतरता हैं। विरासत में मिली गरीबी का बोझ उठाते हुए 55 वर्षीय सुरेंद्र के कंधे अब जबाव देने लगे हैं, लेकिन उसे कहीं न कहीं आस थी कि जवान होता इकलौता बेटा एक न एक दिन बुढ़ापे में उसकी लाठी का सहारा बनेगा, लेकिन शायद दुर्भाग्य ने भी कसम खा रखी है कि इस गरीब व्यक्ति का पीछा आसानी से नहीं छोड़ना हैं।
गत 26 जुलाई को बदिकस्मत सुरेंद्र का बेटा रंजन आम के पेड़ से नीचे गिर गया। रंजन की रीढ़ की हड्डी में गहरी चोट आई है और उसका उपचार टांडा मेडीकल कॉलेज में चल रहा है, लेकिन इलाज पर लाखों रूपए खर्च होने की संभावना हैं। अब गरीब सुरेंद्र अपने बेटे का इलाज कैसे करवा पाएगा, इस पर संशय इसलिए भी है क्योंकि जो व्यक्ति काफी समय पहले अपने घर में जल चुकी बिजली की वायरिंग को ठीक करवाने में असमर्थ रहा और रात को एक कमरे व बरामदे में घुप्प अंधेरा होता है, कैसे बेटे के इलाज़ को लेकर इतनी राशि खर्च कर पाएगा।
दिहाड़ी मजदूरी करने वाले सुरेंद्र के कच्चे मकान की छत्त को हमेशा तूफान का खतरा बना रहता है और बारिश में दो कमरों में बरसात का पानी बिन बुलाए मेहमान की तरह आ पहुंचता हैं। उस गरीब के पास अपने बेटे के इलाज के लिए पैसा कहां से आएगा। दो कमरे के मकान पर टीन की छत बेहद कमजोर है, जिसे बचाने के लिए छत्त पर पत्थर रखे गए हैं ताकि तूफान से टीन कहीं उड़ न जाए। इस गरीब ने तेज हवा बारिश से बचने के लिए आधी-अधूरी खिड़िकयों पर एक राजनीतिक पार्टी का बैनर टांग रखा है ताकि उसके हवा के थपेड़ों से उसका परिवार बचा रहे।
वैसेे तो सुरेंद्र बीपीएल परिवार से संबंधित है, लेकिन उसकी आज तक किसी ने कोई खबर क्यों नहीं ली, यह अपने आप में ही एक प्रश्न है, लेकिन बेटे के साथ हुई त्रासदी के बाद भी किसी ने खैर-खबर नहीं ली, यह भी चौंकाने वाली बात हैं ।
पत्नी की मौत के बाद अकेला संघर्ष कर रहा सुरेंद्र
सुरेंद्र सिंह के तीन बच्चे हैं। जब बच्चे छोटे थे, तो पत्नी की असमय मृत्यु हाे गई। बच्चों के पालन पोषण की जिम्मेवारी को बाप ने कायदे से निभाया। सुरेंद्र सिंह की दो लडकियां और एक लड़का हैं। एक लड़की ग्यारहवीं और एक बारहवीं की पढ़ाई कर रही हैं। वहीं बेटा प्लस टू करके अपने पिता के साथ दिहाड़ी आदि लगा मदद करता था लेकिन एक सप्ताह पहले पेड़ से गिरने से उसकी रीड़ की हड्डी में फ्रेक्चर आ गया हैं। उसकी हालत अत्यंत गंभीर हैं। डाक्टरों की ओर स्व ऑपरेशन करने की बात की है, लेकिन इस पर कितना खर्च आएगा, यह साफ नहीं है। लंबे समय से अपने भाग्य से लड़ रहे सुरेंद्र को अपने बेटे की चिंता सता रही है क्योंकि उसके पास इलाज के लिए पैसे नहीं है। बड़ी मुश्किल से उसने अपने तीन बच्चों को पढ़ाया है, लेकिन बेटे की इस हालत से सुरेंद्र सिंह की हिम्मत टूट चुकी हैं। अभी तक सुरेंद्र सिंह की मदद के लिए न तो प्रशासन ने कोई हाथ बढ़ाए है और न ही किसी भी संस्था ने। सुरेंद्र इस आस में है कि कोई उसकी व्यथा को सुनकर मददके लिए हाथ आगे बढ़ाएगा।
प्रशासन करे मदद:प्रधान
वहीं पंचायत प्रधान डूहल बंगवालां प्रतिभा ने कहा कि सुरेंद्र सिंह का परिवार बीपीएल में पिछले पांच साल से हैं। उनके बेटे का टांडा में इलाज चल रहा हैं, आर्थिक रूप से वह काफी गरीब हैं। प्रशासन से मांग करती हूं कि उनकी आर्थिक मदद करनी चाहिए।
यथास्थिति से अवगत करवाए परिजन, नियमों अनुसार दी जाएगी आर्थिक मदद
वहीं एसडीएम अंब विवेक महाजन ने कहा की
संबंधित परिवार से जुड़े किसी भी सदस्य को शीघ्र मरीज की यथास्थिति के बारे में प्रशासन को अवगत करवाना चाहिए। निश्चित तौर पर प्रशासन की तरफ से जो नियमों के अनुरूप आर्थिक सहायता बनती होगी व मुहैया करवाई जाएगी।
