संजीव महाजन,नूरपुर: प्रदेश में भाजपा पार्टी के दिग्गज नेताओं की जब बात हो तो नूरपुर से भाजपा नेता राकेश पठानिया का नाम इसमें जरूर शामिल होता हैं। राकेश पठानिया ने वर्ष 1991 में भाजपा पार्टी से ही अपने राजनीति का सफर की शुरुआत की थी लेकिन भाजपा के नामी नेताओं में इनका नाम वर्ष 1998 में शामिल हुआ जब राकेश पठानिया ने आम विधानसभा चुनाव में पहली बार कांग्रेस के गढ़ कहे जाने वाले नूरपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीत कर पहली बार भगवा लहराया।
राकेश पठानिया का जन्म 15 नवंबर 1964 को नूरपुर के लदौड़ी गांव में कर्नल काहन सिंह के घर हुआ। राकेश पठानिया ने अपनी शिक्षा पुना, इलाहाबाद और अमृतसर से पूरी की। इनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनीति से नहीं जुड़ी थी बावजूद इसके भी राकेश पठानिया की राजनीति में रुचि थी और यही वजह थी कि इन्होंने वर्ष 1991 में अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की। इस दौरान जिला भाजपा किसान मोर्चा के अध्यक्ष, प्रदेश सचिव किसान मोर्चा व प्रदेश भाजपा कार्यकारिणी सदस्य के पदों पर रहते हुए राकेश पठानिया ने भाजपा में काम किया।
इसके बाद जब नरेंद्र मोदी प्रदेश भाजपा के प्रभारी थे तो उन्होंने पठानिया को चुनावी मैदान में उतारा। तब
कांग्रेस का गढ़ कहे जाने वाले नूरपुर विधानसभा क्षेत्र में राकेश पठानिया ने 1996 में भाजपा प्रत्याशी के रूप में अपना पहला उपचुनाव लड़ा। इस चुनाव में भले ही राकेश पठानिया को जीतना मिली हो लेकिन कांग्रेस को उन्होंने यहां कांटे की टक्कर दी थी इस चुनाव में वह मात्र एक हजार मतों से पराजित हुए थे।
उनकी हार के बावजूद भी पार्टी का उन पर से विश्वास नहीं डगमगाया और एक बार फिर वर्ष 1998 के आम विधानसभा चुनाव में राकेश पठानिया ने पहली बार कांग्रेस के गढ़ कहे जाने वाले नूरपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीत कर पहली बार भगवा लहराया। इसके चलते वह तत्कालीन धूमल सरकार में पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष भी रहे। राकेश पठानिया ने जिस तरह कांग्रेस के गढ़ माने जानी वाली विधानसभा में जीत हासिल की उससे उनका पार्टी में कद भी बढ़ा और वे भाजपा के हनुमान शब्द से नवाजे जाने लगे, हालांकि इसके बाद राकेश पठानिया के पार्टी से कुछ मतभेद भी हुए जिसके चलते हैं उन्होंने दो बार आजाद प्रत्याशी के रूप में है नूरपुर विधानसभा से चुनाव लड़ा।
वहीं नूरपुर में 1998-2003 के बाद भाजपा लगातार हार रही थी। इस हार को बदलने के चलते एक बार फिर भाजपा पार्टी ने 2017 को विधानसभा चुनाव से ठीक कुछ समय पहले एक बार फिर राकेश पठानिया को टिकट दिया। राकेश पठानिया ने बहुत कम समय में जो पार्टी बिखर चुकी थी या समर्थक बिखर चुके थे उन्हें इकट्ठा किया और एक बार फिर से नूरपुर में भाजपा की हार को जीत में तब्दील कर दिया। राकेश पठानिया की जीत से एक बार फिर भाजपा ने नूरपुर में मजबूती पकड़ी और राकेश पठानिया भी भाजपा पार्टी एक ताकतवर नेता के रुप में पूरे हिमाचल में जाने लगे। इस जीत को हासिल करके उन्होंने नूरपुर के विकास करना शुरू कर दिया। वहीं पठानिया के मंत्री बनने के बाद उन्होंने नगर परिषद कमेटी चुनाव में भी कांग्रेस के गढ़ मानी जाने वाली नगर परिषद कमेटी में भाजपा समर्थक उम्मीदवार को जीत हासिल करवाने में अहम भूमिका निभाई और भाजपा के समर्थन में नूरपूर नगर परिषद कमेटी अध्यक्ष भी बनाया।
वर्ष 2020 में बनाया गया कैबिनेट मंत्री
राकेश पठानिया को भाजपा पार्टी में अगस्त 2020 में कैबिनेट मंत्री बनाया गया और उन्हें वन, युवा सेवाएं एवं खेल विभाग दिया गया। कैबिनेट मंत्री बनने के बाद उन्होंने नूरपुर के विकास कार्यों को आगे बढ़ाया और पार्टी की ओर से इन्हें जहां भी भेजा गया वहां उन्होंने पार्टी को आगे बढ़ाने की कोशिश की ।
नूरपुर में विकास को ऐसे दी रफ्तार
नूरपुर विधानसभा क्षेत्र के विकास के लिए भी राकेश पठानिया ने बहुत से काम किए। उन्होंने नूरपुर को पुलिस जिला, ब्रजराज स्वामी मंदिर के जन्माष्टमी उत्सव को राज्यस्तरीय दर्जा , सदवा को उप तहसील का दर्जा, नूरपुर में जायका प्रोजक्ट, नूरपुर में इंडोर स्टेडियम,सैशन कोर्ट, फिन्ना सिंह नहर ,पुल सड़के ,गाव में खेल मैदान , नूरपुर कालेज की बिल्डिंग ओर नूरपुर में एक नया कालेज बनवाने के साथ ही कई ओर अहम कार्य करवाएं है। नूरपुर विधानसभा का विकास कांग्रेस के सत महाजन जो कि दो तीन बार मंत्री रहे चुके हैं उन्होंने या पहली बार वन मंत्री बने राकेश पठानिया ने करवाया है।
पार्टी और समर्थकों के साथ के लिए जाने जाते हैं राकेश पठानिया
राकेश पठानिया की एक खूबी जो उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाती है, वो यह है कि वह पार्टी व अपने समर्थकों का साथ निभाने में कोई कमी नहीं छोड़ते है। जब भी कहीं भी भाजपा नेताओं की कोई जनसभा हो उसमें राकेश पठानिया अपने सबसे ज्यादा समर्थकों को लेकर पहुंचते है।
दो बार लड़ा आजाद उम्मीदवार के तौर पर चुनाव
राकेश पठानिया ने भले ही भाजपा को नूरपुर सीट को जीतने में यह मोनिका निभाई हो लेकिन पार्टी से उनके मतभेद भी रहे थे और यही वजह थी कि कुछ मतभेदों के चलते हैं पार्टी ने उन्हें वर्ष 2007 के चुनावों में टिकट नहीं दिया था। टिकट ना मिलने के बाद जनता और अपने समर्थकों के कहने व उनके साथ पर राकेश पठानिया ने आजाद चुनाव लड़ा और जीत हासिल की और बतौर आजाद विधायक काम किया। इसके बाद 2012 का चुनाव भी इन्होंने आजाद चुनाव प्रत्याशी के रूप में लड़ा लेकिन इस बार जीत हासिल नहीं कर सके और ना भाजपा अपना परचम नूरपुर विधानसभा में लहरा पाई । अब आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर राकेश पठानिया की भूमिका अहम मानी जा रही है ऐसे में देखना ये होगा कि पार्टी इस बार इन पर कितना विश्वास जताती हैं।
