सचिन शर्मा, लाहौल स्पीति: भारतीय वानिकी अनुसंधान एवम शिक्षा परिषद, पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के संयुक्त तत्वाधान से जुनिपर शुक्पा की नर्सरी तकनीक एवं महत्वपूर्ण सम शीतोष्ण औषधीय पौधों की खेती पर एक दिवसीय कार्यशाला स्पीति में आयोजित की गई। इस कार्यशाला में बतौर मुख्यतिथि संस्थान के महानिदेशक ए.एस रावत उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि जुनिपर शुक्पा पौधे के औषधीय कीमत बहुत हैं। कई हिमालय के राज्यों में यह पौधा काफी विकसित हो रहा हैं। इससे जहां पर्यावरण भी सुरक्षित होता है वहीं लोगों को आय के साधन भी विकसित होते हैं।
जुनिपर (पेंसिल सिडार) उत्तर-पश्चिम हिमालयी क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण शंकुधारी वृक्ष हैं। भारत वर्ष में यह वृक्ष मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश के किन्नौर एवं लाहौल और स्पीति जिले में और जम्मू-कश्मीर के गुरेज घाटी और लद्दाख क्षेत्र सहित उत्तराखंड के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाया जाता हैं। वहां की स्थानीय भाषा में इसे शूर, शुक्पा, शुर्गु, लाशूक एवं धूप नाम से जाना जाता हैं।
विशिष्ठ अतिथि के तौर पर एडीसी राहुल जैन ने कहा कि स्पीति में इस पौधे से कई लोगों को फायदा हो सकता हैं। घर में ही लोगों को आय होगी और यहां की आर्थिकी मजबूत होगी। संस्थान के निदेशक डॉ. संदीप शर्मा ने बताया कि ताबो में जूनिपर की नर्सरी एवं पौधरोपण तकनीक विकसित करने में सफलता पाई गई हैं। उन्होंने कहा कि पहले इसकी नर्सरी और पौधरोपण नहीं थी, जिससे कारण वन विभाग पौधरोपण के लिए इसके पौधे तैयार नहीं कर पा रहा था, परंतु संस्थान की ओर से विकसित की नर्सरी तकनीक से इसके पौधरोपण के द्वार खुल गए हैं।
