भावना शर्मा: देव भूमि हिमाचल में देवी-देवताओं के असंख्य मंदिर हैं, जिनपर ना केवल हिमाचल बल्कि हिमाचल के बाहर के लोगों की भी अटूट आस्था जुड़ी हैं। यहां के प्रत्येक मंदिर के साथ हमारी समृद्ध संस्कृति, मान्यताएं और इतिहास भी जुड़ा हैं। ऐसा ही एक धार्मिक स्थल हैं जिला कांगड़ा के पालमपुर से 15 किलोमीटर दूर ठाकुरद्वारा-सुजानपुर मार्ग पर ग्राम पंचायत बारी भवारना में स्थित बाबा भिखाशाह मजार। हिमाचल में यह एक ऐसा धार्मिक स्थल हैं जहां एक ही छत के नीचे मंदिर और मजार दोनों स्थित हैं। यह स्थल लोगों की आस्था का प्रतीक हैं और स्थानीय लोगों के साथ-साथ बाहर से भी लोग इस अनोखे धार्मिक स्थल में आते हैं।
हिंदू समुदाय के लोग जहां इस मंदिर में माथा टेकने के लिए आते हैं तो वहीं मुस्लिम समुदाय के लोगों भी मजार पर माथा देखने के लिए यहां आते हैं। लोगों की अटूट आस्था के चलते वर्षभर यह धार्मिक स्थल आकर्षण का केंद्र बना रहता हैं। ज्येष्ठ माह में इस
बाबा की मजार पर माथा टेकने का विशेष महत्व माना गया और यहां प्रतिवर्ष ज्येष्ठ माह की सक्रांति से मेला आरंभ होता है, जो 9 दिनों तक चलता हैं। यह कैसा धार्मिक स्थल है जहां किसी तरह के समुदाय को कोई भेदभाव नहीं हैं और सभी समुदाय के लोग इस मजार पर माथा टेकने के लिए आते हैं।
तीन सौ वर्ष पुराना हैं इस धार्मिक स्थल का इतिहास
भिखाशाह मजार और मंदिर के नाम से प्रसिद्ध इस धार्मिक स्थल का इतिहास तीन सौ साल पुराना हैं। इसके पीछे की कहानी भी काफी रोचक हैं। जानकारी के अनुसार लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व लंबागांव के नागवन के जंगल में फकीर मस्त अली शाह तपस्या में लीन रहते थे। पहुंचे हुए फकीर होने के चलते हिंदू ओर मुस्लिम दोनों समुदायओं के लोग इनके शिष्य थे। एक बार फकीर, दुखी पंडित के घर गए और पंडित से समस्या पूछने पर उसने बताया कि घर में संतान नहीं होने से दुखी हैं। फकीर ने पंड़ित को एक फल भेंट कर पत्नी को खिलाने को दिया और कहा कि उसके घर दो संताने पैदा होंगी। फकीर ने दो में से बड़ा लड़का उन्हें देने की भी बात कही। इस आर्शीवाद से पंडित खुश हुआ और फकीर की बात मान ली।
समय के साथ पंडित के यहां दो बेटों ने जन्म लिया,
जिनके नाम भिखू ओर भोंदू रखे। पंडित परिवार खुशी में फकीर को दिया वचन भूल गया, और लगभग पांच वर्ष बाद फकीर ने पंडित के घर दस्तक दी और पंडित को दिया वचन याद दिलाया। पंडित को बड़ा बेटा फकीर को देना पड़ा और छोटा बेटा भी उनके साथ हो लिया। दोनों भिखू ओर भोंदू फकीर की देख-रेख में शिक्षा ग्रहण करने लगे। फकीर चमत्कारी थे और समय के साथ दोनों लड़के भी परांगत हो गए।
एक बार दोनों गांव में भीक्षा मांगने गए वहां एक वृद्धा रो रही थी। पूछने पर उसने बताया कि उसकी गाय मर गई थी। दोनों से रहा नहीं गया। उन्होंने लोटे में पानी मंगवाया और गाय पर पानी के छींटे डालने पर गाय जीवित हो गई। इस घटना का पता जब फकीर को लगा तो फकीर दोनों पर नाराज हुए ओर कहा कि जीवन और मृत्यु भगवान के हाथ हैं और उन्हें ऐसा न करने की बात कही। एक दिन दोनों लकड़ियां लेने के लिए जंगल में गए, तो उन्होंने देखा कि कुछ लोग अर्थी लेकर जा रहे थे। उन्होंने सोचा कि इन लोगों से उन्हें लकड़ियां मिल सकती हैं। वो दोनों गुरू की बात भूलकर लोगों से कहने लगे की अगर वह इस मृत
आदमी को जीवित करें तो उन्हें सारी लकड़ियां देनी पड़ेंगी। एक बार फिर दोनों ने पानी का लोटा मंगवाया और मृत आदमी को पानी के छिंटे देकर जीवित कर दिया। इस घटना के बाद इलाके में भोंदू ओर भीखू की जय-जयकार होने लगी।
घटना का फकीर को पता लगने पर वह गुस्से से तिलमिला उठे और उन्होंने अपना चिमटा गर्म कर दोनों की ओर भागे। गुरू का गुस्सा देख भिखू भवारना की ओर,ओर भोंदू नादौन की ओर भागा। चमत्कारी गुरू ने एक साथ दोनों का पीछा किया। भीखू भवारना में पहुंचकर धरती मां शरण की गुहार लगाई जिससे धरती फट गई और भिखू उसमें समा गया। जबकि भोंदू नादौन में धरती में समा गया इसके बाद फकीर को भी किसी ने नहीं देखा। भीखू ने जहां समाधि ली थी उस स्थान पर कांगड़ा के राजा
संसार चंद ने मजार बनवाकर उसको पक्का करवाया, जो आज भिखाशाह के नाम से विख्यात हैं।
मजार पर चढ़ाई जाती हैं चादर
भिखाशाह मजार जिसे अब मंदिर के नाम से भी जाना जाता हैं यहां आज भी लोग मजार पर चादर चढ़ाते हैं। चाहे हिंदू समुदाय के लोग मंदिर में आए या फिर मुस्लिम समुदाय के लोग आज भी यहां चादर चढ़ाने की परंपरा बनी हुई हैं।
स्थानीय लोग चढ़ाते हैं धार्मिक स्थल में पहली फसल, गाय का घी और दूध
भिखाशाह मंदिर मजार से स्थानीय लोगों की आस्था जुड़ी हैं। आज भी यहां आस-पास के क्षेत्र के लोग वर्ष भर घर में दुधारू पशु के पहले दुध को और नई फसल को बाबा की मजार पर चढ़ाने के उपरांत ही खाने के
लिए इस्तेमाल करते हैं।
किसान मेले के रूप में लगता था मेला अब बदला स्वरूप
भिखाशाह मंदिर में जेष्ठ माह में लगने वाला मेला पहले किसान मेले के रूप में विख्यात था। इस मेले में बड़े स्तर पर बेलों के अतिरिक्त भेड़-बकरियों, दूधारू पशुओं व्यापार होता था। समय के साथ-साथ कृषि में आधुनिकीकरण के साथ अब पशुओं का व्यापार नाम मात्र ही रहा हैं। पुराने समय यह मेला नई फसल आने के बाद लोगों के लिए व्यापार और रोजमर्रा के जरूरी सामान खरीदारी ओर आपसी मिलन का भी एक केंद्र हुआ करता था। समय के साथ-साथ लोगों की जरूरतों और मांग को देखते हुए मेले के स्वरूप में भी परिवर्तन आया हैं और आयोजकों ने मेले को ओर अधिक आकर्षक बनाने के लिए लोगों की सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए ग्रामीण खेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को इसमें शामिल किया हैं।
